रिपोर्टर : सोनू राणा
छुटमलपुर। नया शैक्षणिक सत्र शुरू होते ही छुटमलपुर और आसपास के निजी स्कूलों की मनमानी ने अभिभावकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
शिक्षा को व्यापार बना चुके इन स्कूलों में किताबों के नाम पर घोर कमीशन का खेल चल रहा है, जबकि शिक्षा विभाग कार्रवाई के नाम पर पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है।
अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल प्रबंधन उनकी जेबों पर खुलेआम डाका डाल रहा है।
दाखिले के समय ही स्कूल प्रबंधक अभिभावकों को प्रेम पुस्तक भंडार जैसी मनचाही दुकानों से किताबें खरीदने के लिए मजबूर कर देते हैं।
हर साल नए सिलेबस की आड़ में पुरानी किताबें बेकार हो जाती हैं। स्कूल प्रबंधन प्रकाशकों से 30 से 50 प्रतिशत तक भारी कमीशन लेकर मनचाहे प्रकाशकों की महंगी किताबें बच्चों पर थोप रहे हैं।
जहां सरकारी स्कूलों में एक किताब 50 रुपये में उपलब्ध होती है, वहीं निजी स्कूल वही किताब 100 से 300 रुपये तक में बेच रहे हैं।
एनसीईआरटी की सस्ती और गुणवत्तापूर्ण किताबों की जगह मोटा मुनाफा कमाने के लिए निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें पढ़ाई जा रही हैं।
शिक्षकों की योग्यता पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। निजी स्कूलों में शिक्षकों की शैक्षिक योग्यता और प्रशिक्षण के कोई मानक तय नहीं हैं।
कम पढ़े-लिखे और अप्रशिक्षित युवक-युवतियों को बहुत कम वेतन पर रखकर स्कूल मोटा मुनाफा कमा रहे हैं, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित हो रही है।
स्कूलों की मनमानी सिर्फ किताबों तक ही नहीं रुकी है। दाखिले के एक महीने बाद बिना किसी पूर्व सूचना के फीस बढ़ा दी जाती है।
अभिभावक चाहकर भी बच्चों को स्कूल से नहीं निकाल पाते क्योंकि गरीब और मध्यम वर्ग के पास विकल्प बेहद सीमित हैं।
मंहगाई के इस दौर में शिक्षा इतनी महंगी हो गई है कि कई परिवार कर्ज लेकर अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं।
अभिभावकों का गुस्सा अब शिक्षा विभाग पर भी फूट रहा है। उनका कहना है कि अगर अधिकारी स्कूलों में छापेमारी करें तो किताबों के ढेर और अनियमितताएं आसानी से सामने आ जाएंगी, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आ रही है।
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या छुटमलपुर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में निजी स्कूल शिक्षा माफिया की तरह काम करते रहेंगे?
अभिभावकों पर दबाव, भारी कमीशन और मनमानी फीस वृद्धि ने शिक्षा को आम आदमी की पहुंच से दूर कर दिया है।
अभिभावक मांग कर रहे हैं कि जिला अधिकारी तुरंत शिक्षा विभाग को सख्त जांच के आदेश दें और उत्तर प्रदेश सरकार के शिक्षा मंत्री इस ओर ध्यान दें।
क्या सरकार और शिक्षा विभाग निजी स्कूलों की इस मनमानी पर लगाम लगा पाएंगे, या अभिभावक इसी तरह लुटते रहेंगे? यह समय है सख्त कार्रवाई का।
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